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Saturday, October 15, 2022

।।ॐ गुरवे नमः।।🙏🏻🌹🙏🏻

हरि ओम जी🙏🏻😊
आज के (15/10/22) दिशा सत्संग के अमृतबिंदू-

🌹 हमे एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिए। *आप जो भी चीज करते हो, उसमें एकाग्र हो जाए। पूरा मन उसमें लगाए तो चमत्कार होगा।*

🌹 *भगवान कृष्ण कहते हैं -विभक्त सेवी बनो-एकांत का चयन करना सीखो।* एकांत में जब एकाग्र हो जाए, तो भगवान ने जो अंदर दिया है वह प्रकट होगा। 

🌹 *अटैचमेंट और डिटैचमेंट का भी अभ्यास करें। मन को जोड़ना और ध्यान हटाना भी आ जाए।* इस अभ्यास की *शुरुआत स्वाद को जीतने से करें।* उपवास- व्रत स्वाद जीतने के लिए है। फिर *वाणी का संयम करें, मिताहारी बने।* 

🌹 *तुलसी का पौधा बहुत अद्भुत काम करता है-हमारे पूर्वजों ने इसीलिए घर के बाहर यह पौधा लगाने का विधान दिया।* भगवान को भोग लगाते भी तुलसीदल ऊपर रखा जाता है।

🌹 *तुलसी के पत्ते खून पतला करते हैं। 5 तरह की तुलसी का अर्क पानी में ले तो ज्यादा लाभ मिलता है*। घी और तेल को भी पचाने के लिए भोजन के आधे घंटे बाद गर्म पानी का सेवन करें। *कार्डियो एक्सरसाइज, योग और प्राणायाम जरूर करें।* 

🌹 *हम अपने कंफर्ट झोन से बाहर निकल ने के लिए हिम्मत करें। परिवर्तन के लिए, कष्ट सहने के लिए तैयार रहे तो आप दायरे से बाहर होंगे।*
 कभी-कभी प्रकृति अपने आप परिवर्तन कराती है- पुरानी नौकरी छुट्ती  है, परेशानी आती है। कुछ दिन बाद बड़ा काम मिलता है, पैसा, बड़ी खुशियां मिलती है -तो व्यक्ति शिकायत से बाहर निकलकर धन्यवाद करता है। तब एहसास होता है -पहलेवाली नौकरी छूटती नही तो जो अब मिला है वह नहीं मिलता। *हम परिवर्तन से डरते हैं।* 

🌹 *हमें लेफ्ट और राइट ब्रेन में संतुलन साधना चाहिए।* ज्यादा इमोशनल बने तो धोखा खाएंगे और ज्यादा तार्किक बने तो रिश्तो को संभाल नहीं पाओगे। दोनों में संतुलन जरूरी है। साधना में यही सिखाया जाता है। 

हरि ओम जी🙏🏻😊
आप का हर पल मंगलमय हो, सब सुखी निरोग रहे।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Saturday, October 23, 2021

Kahani

💐💐स्वर्ग  और नरक💐💐
एक बुजुर्ग औरत मर गई, यमराज लेने आये।
औरत ने यमराज से पूछा, आप मुझे स्वर्ग ले जायेगें या नरक।
यमराज बोले दोनों में से कहीं नहीं।
तुमनें इस जन्म में बहुत ही अच्छे कर्म किये हैं, इसलिये मैं तुम्हें सिधे प्रभु के धाम ले जा रहा हूं।
बुजुर्ग औरत खुश हो गई, बोली धन्यवाद, पर मेरी आपसे एक विनती है।
मैनें यहां धरती पर सबसे बहुत स्वर्ग - नरक के बारे में सुना है मैं एक बार इन दोनों जगाहो को देखना चाहती हूं।
यमराज बोले तुम्हारे कर्म अच्छे हैं, इसलिये मैं तुम्हारी ये इच्छा पूरी करता हूं।चलो हम स्वर्ग और नरक के रसते से होते हुए प्रभु के धाम चलेगें।
दोनों चल पडें, सबसे पहले नरक आया।
नरक में बुजुर्ग औरत ने जो़र जो़र से लोगो के रोने कि आवाज़ सुनी।
वहां नरक में सभी लोग दुबले पतले और बीमार दिखाई दे रहे थे।
औरत ने एक आदमी से पूछा यहां आप सब लोगों कि ऐसी हालत क्यों है।
आदमी बोला तो और कैसी हालत होगी, मरने के बाद जबसे यहां आये हैं, हमने एक दिन भी खाना नहीं खाया।
भूख से हमारी आत्मायें तड़प रही हैं
बुजुर्ग औरत कि नज़र एक वीशाल पतीले पर पडी़, जो कि लोगों के कद से करीब 300 फूट ऊंचा होगा, उस पतीले के ऊपर एक विशाल चम्मच लटका हुआ था।
उस पतिले में से बहुत ही शानदार खुशबु आ रही थी।
बुजुर्ग औरत ने उस आदमी से पूछा इस पतिले में क्या है।
आदमी मायूस होकर बोला ये पतीला बहुत ही स्वादिष्ट खीर से हर समय भरा रहता है।
बुजुर्ग औरत ने हैरानी से पूछा, इसमें खीर है,तो आप लोग पेट भरके ये खीर खाते क्यों नहीं, भूख से क्यों तड़प रहें हैं।
आदमी रो रो कर बोलने लगा, कैसे खायें,ये पतीला 300 फीट ऊंचा है हममें से कोई भी उस पतीले तक नहीं पहुँच पाता।
बुजुर्ग औरत को उन पर तरस आ गया
सोचने लगी बेचारे, खीर का पतिला होते हुए भी भूख से बेहाल हैं।
शायद ईश्वर नें इन्हें ये ही दंड दिया होगा,
यमराज बुजुर्ग औरत से बोले चलो हमें देर हो रही है।
दोनों चल पडे़, कुछ दूर चलने पर स्वरग आया।
वहां पर बुजुर्ग औरत को सबकी हंसने,खिलखिलाने कि आवाज़ सुनाई दी।
सब लोग बहुत खुश दिखाई दे रहे थे।
उनको खुश देखकर बुजुर्ग औरत भी बहुत खुश हो गई।
पर वहां स्वर्ग में भी बुजुर्ग औरत कि नज़र वैसे ही 300 फूट उचें पतीले पर पडी़ जैसा नरक में था, उसके ऊपर भी वैसा ही चम्मच लटका हुआ था।
बुजुर्ग औरत ने वहां लोगो से पूछा इस पतीले में क्या है।
स्वर्ग के लोग बोले के इसमें बहुत टेस्टी खीर है।बुजुर्ग औरत हैरान हो गई,उनसे बोली पर ये पतीला तो 300 फीट ऊंचा है।
आप लोग तो इस तक पहुँच ही नहीं पाते होगें,उस हिसाब से तो आप लोगों को खाना मिलता ही नहीं होगा, आप लोग भूख से बेहाल होगें।
पर मुझे तो आप सभी इतने खुश लग रहे हो, ऐसे कैसे,
लोग बोले हम तो सभी लोग इस पतिले में से पेट भर के खीर खाते हैं,औरत बोली पर कैसे,पतीला तो बहुत ऊंचा है।
लोग बोले तो क्या हो गया पतीला ऊंचा है तो ,यहां पर कितने सारे पेड़ हैं, ईश्वर ने ये पेड़ पौधे, नदी, झरने हम मनुष्यों के उपयोग के लिये तो बनाईं हैं।
हमनें इन पेडो़ कि लकडी़ ली, उसको काटा, फिर लकडियों के टूकडो़ को जोड़ के विशाल सीढी़ का निर्माण किया।
उस लकडी़ की सिढी़ के सहारे हम पतीले तक पहुंचते हैं और सब मिलकर खीर का आंनद लेते हैं,बुजुर्ग औरत यमराज कि तरफ देखने लगी ।
यमराज मुसकाये बोले:-ईश्वर ने स्वर्ग और नरक मनुष्यों के हाथों में ही सौंप रखा है,चाहें तो अपने लिये नरक बना लें, चाहे तो अपने लिये स्वरग, ईश्वर ने सबको एक समान हालातो में डाला हैं।
उसके लिए उसके सभी बच्चें एक समान हैं, वो किसी से भेदभाव नहीं करता।
वहां नरक में भी पेेड़ पौधे सब थे, पर वो लोग खुद ही आलसी हैं, उन्हें खीर हाथ में चाहिये,वो कोई कर्म नहीं करना चाहते, कोई मेहनत नहीं करना चाहते, इसलिये भूख से बेहाल हैं।
क्योंकि ये ही तो ईश्वर कि बनाई इस दुनिया का नियम है, जो कर्म करेगा, मेहनत करेगा, उसी को मीठा फल खाने को मिलेगा।स्वर्ग और नरक आपके हाथ में है,मेहनत करें, अच्छे कर्म करें और अपने जीवन को स्वर्ग बनाएं।
सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

Friday, October 22, 2021


कैसा भी वातावरण हो, थोड़ा खुश रहने का अभिनय कर लीजिए। इस अभिनय से ही आपकी जिन्दगी में खुशहाली आ जाएगी।


परम पूज्य सुधांशुजी महाराज

अपने बच्चों





अपने बच्चों को अमीर बनाने का प्रयास मत करो,उन्हें अमीर बनाने की विधी सिखा दो।

 

Do not try to make your kids rich; instead teach them the method to become rich.

Thursday, October 14, 2021

Kahani

🌹 *नजरिया* 🌹

*एक सन्त*
*प्रात: काल भ्रमण हेतु*
*समुद्र के तट पर पहुँचे...*

*समुद्र के तट पर*
*उन्होने एक पुरुष को देखा जो एक स्त्री की गोद में सर रख कर सोया हुआ था.*

*पास में शराब की खाली बोतल पड़ी हुई थी.*
*सन्त बहुत दु:खी हुए.*

*उन्होने विचार किया कि ये मनुष्य कितना तामसिक और विलासी है, जो प्रात:काल शराब सेवन करके स्त्री की गोद में सर रख कर प्रेमालाप कर रहा है.*

*थोड़ी देर बाद समुद्र से बचाओ, बचाओ की आवाज आई,*

*सन्त ने देखा एक मनुष्य समुद्र में डूब रहा है,*
*मगर स्वयं तैरना नहीं आने के कारण सन्त देखते रहने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे.*

*स्त्री की गोद में सिर रख कर सोया हुआ व्यक्ति उठा और डूबने वाले को बचाने हेतु पानी में कूद गया.*

*थोड़ी देर में उसने डूबने वाले को बचा लिया और किनारे ले आया.*

*सन्त विचार में पड़ गए की इस व्यक्ति को बुरा कहें या भला.*

*वो उसके पास गए और बोले भाई तुम कौन हो, और यहाँ क्या कर रहे हो...?*

*उस व्यक्ति ने उत्तर दिया : —*

*मैं एक मछुआरा हूँ*
*मछली मारने का काम करता हूँ.आज कई दिनों बाद समुद्र से मछली पकड़ कर प्रात: जल्दी यहाँ लौटा हूँ.*

*मेरी माँ मुझे लेने के लिए आई थी और साथ में(घर में कोई दूसरा बर्तन नहीं होने पर) इस मदिरा की बोतल में पानी ले आई.*

*कई दिनों की यात्रा से मैं थका हुआ था*
*और भोर के सुहावने वातावरण में ये पानी पी कर थकान कम करने माँ की गोद में सिर रख कर ऐसे ही सो गया.*

*सन्त की आँखों में आँसू आ गए कि मैं कैसा पातक मनुष्य हूँ, जो देखा उसके बारे में*
*मैंने गलत विचार किया जबकि वास्तविकता अलग थी.*

*कोई भी बात जो हम देखते हैं, हमेशा जैसी दिखती है वैसी नहीं होती है उसका एक दूसरा पहलू भी हो सकता है.*

*किसी के प्रति*
*कोई निर्णय लेने से पहले*
*सौ बार सोचें और तब फैसला करें..!!*

   *🙏 जय श्री सीताराम 🙏*

Friday, October 1, 2021

Kahani

*🌹 परमात्मा का द्वार 🌹*

*एक बार एक पुत्र अपने  पिता से रूठ कर घर छोड़ के दूर चला गया और फिर इधर उधर यूँ ही भटकता रहा।*

 *दिन बीते, महीने बीते और साल बीत गए!एक दिन वह बीमार पड़ गया।* 

*अपनी झोंपड़ी में अकेले पड़े उसे अपने पिता के प्रेम की याद आई, कि कैसे उसके पिता उसके बीमार होने पर, या दुखी होने पर, उसकी सेवा किया करते थे।* 

*उसे बीमारी में इतना प्रेम मिलता था, कि वो स्वयं ही शीघ्र अति शीघ्र ठीक हो जाता था। उसे फिर एहसास हुआ कि उसने घर छोड़ कर बहुत बड़ी गलती की है।* 

*वो रात के अँधेरे में ही घर की ओर हो लिया।*
*जब घर के नजदीक गया तो उसने देखा कि आधी रात के बाद भी उसके घर का दरवाज़ा खुला हुआ है।* 

*अनहोनी के डर से वो तुरंत भाग कर अंदर गया तो उसने पाया की आंगन में उसके पिता लेटे हुए हैं।* 

*उसे देखते ही उन्होंने उसका बांहे फैला कर स्वागत किया, पुत्र की आँखों में आंसू आ गए!*
*उसने पिता से पूछा : "ये घर का दरवाज़ा खुला है,क्या आपको आभास था कि मैं आऊंगा..??"*

*पिता ने उत्तर दिया : "अरे पगले ये दरवाजा उस दिन से बंद ही नहीं हुआ.. जिस दिन से तू गया है।* 

*मैं सोचता था कि पता नहीं तू कब आ जाये और कंही ऐसा न हो कि दरवाज़ा बंद देख कर तू वापिस लौट जाये..!!"*

*ठीक यही स्थिति उस परमपिता परमात्मा की है, उसने भी प्रेमवश अपने बच्चों के लिए द्वार खुले रख छोड़े हैं, कि पता नहीं कब भटकी हुई उनकी कोई संतान उसकी ओर लौट आए..!!*

*हमें भी आवश्यकता है तो सिर्फ इतनी कि उसके प्रेम को समझे और उसकी ओर बढ़ चलें..!!*

 *सदा स्मृति रहे कि--*
 *आप एक शांत स्वरूप और प्रेम स्वरूप आत्मा है*
*अपनेे  इष्ट माता-पिता व गुरुदेव को न भूलें।*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

    *🙏 जय श्री सीताराम 🙏*

Monday, September 20, 2021

🌹 *निंदक महाराज* 🌹

*एक थे सर्वनिंदक महाराज। काम-धाम कुछ आता नहीं था पर निंदा गजब की करते थे।हमेशा औरों के काम में टाँग फँसाते थे।*
   
*अगर कोई व्यक्ति मेहनत करके सुस्ताने भी बैठता तो कहते, 'मूर्ख एक नम्बर का कामचोर है। अगर कोई काम करते हुए मिलता तो कहते, 'मूर्ख जिंदगी भर काम करते हुए मर जायेगा।'*
    
*कोई पूजा-पाठ में रुचि दिखाता तो कहते, 'पूजा के नाम पर देह चुरा रहा है। ये पूजा के नाम पर मस्ती करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता।' अगर कोई व्यक्ति पूजा-पाठ नहीं करता तो कहते, 'मूर्ख नास्तिक है! भगवान से कोई मतलब ही नहीं है। मरने के बाद पक्का नर्क में जायेगा।'*
    
*माने निंदा के इतने पक्के खिलाड़ी बन गये कि आखिरकार नारदजी ने अपने स्वभाव अनुसार.. विष्णु जी के पास इसकी खबर पहुँचा ही दिया। विष्णु जी ने कहा 'उन्हें विष्णु लोक में भोजन पर आमंत्रित कीजिए।'*
    
*नारद तुरंत भगवान का न्योता लेकर सर्वनिंदक महाराज के पास पहुँचे और बिना कोई जोखिम लिए हुए उन्हें अपने साथ ही विष्णु लोक लेकर पहुँच गये कि पता नहीं कब महाराज पलटी मार दे।*
    
*उधर लक्ष्मी जी ने नाना प्रकार के व्यंजन अपने हाथों से तैयार कर सर्वनिंदक जी को परोसा। सर्वनिंदक जी ने जमकर हाथ साफ किया। वे बड़े प्रसन्न दिख रहे थे। विष्णु जी को पूरा विश्वास हो गया कि सर्वनिंदक जी लक्ष्मी जी के बनाये भोजन की निंदा कर ही नहीं सकते। फिर भी नारद जी को संतुष्ट करने के लिए पूछ लिया, और महाराज भोजन कैसा लगा?*
    
*सर्वनिंदक जी बोले, महाराज भोजन का तो पूछिए मत, आत्मा तृप्त हो गयी। लेकिन... भोजन इतना भी अच्छा नहीं बनना चाहिए कि आदमी खाते-खाते प्राण ही त्याग दे।*
    
*विष्णु जी ने माथा पीट लिया और बोले, 'हे वत्स, निंदा के प्रति आपका समर्पण देखकर मैं प्रसन्न हुआ। आपने तो लक्ष्मी जी को भी नहीं छोडा़, वर माँगो।*
    
*सर्वनिंदक जी ने शर्माते हुए कहा -- हे प्रभु मेरे वंश में वृध्दि होनी चाहिए।*

*तभी से ऐसे निरर्थक सर्वनिंदक सभी जगहों में पाए जाने लगे..*

*सार :हम चाहे कुछ भी कर लें.. इन निंदकों की प्रजाति को संतुष्ट नहीं कर सकते!*
*अतः ऐसे लोगों की परवाह किये बिना अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहना चाहिए।*

     *🙏 जय श्री सीताराम 🙏*

Friday, September 17, 2021

Ail Rocha kahani

#जय_श्री_राधे_कृष्णा 

एक प्राथमिक स्कूल मे अंजलि नाम की एक शिक्षिका थीं वह कक्षा 5 की क्लास टीचर थी, उसकी एक आदत थी कि वह कक्षा मे आते ही हमेशा "LOVE YOU ALL" बोला करतीं थी।
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मगर वह जानती थीं कि वह सच नहीं बोल रही । 
वह कक्षा के सभी बच्चों से एक जैसा प्यार नहीं करती थीं।
कक्षा में एक ऐसा बच्चा था जो उनको फटी आंख भी नहीं भाता था। उसका नाम राजू था। राजू मैली कुचेली स्थिति में स्कूल आ जाया करता है। उसके बाल खराब होते, जूतों के बन्ध खुले, शर्ट के कॉलर पर मेल के निशान । पढ़ाई के दौरान भी उसका ध्यान कहीं और होता था।
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मेडम के डाँटने पर वह चौंक कर उन्हें देखता, मगर उसकी खाली खाली नज़रों से साफ पता लगता रहता.कि राजू शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित होने के बावजूद भी मानसिक रूप से गायब हे यानी (प्रजेंट बाडी अफसेटं माइड) .धीरे धीरे मेडम को राजू से नफरत सी होने लगी। क्लास में घुसते ही राजू मेडम की आलोचना का निशाना बनने लगता। सब बुराई उदाहरण राजू के नाम पर किये जाते. बच्चे उस पर खिलखिला कर हंसते.और मेडम उसको अपमानित कर के संतोष प्राप्त करतीं। 
राजू ने हालांकि किसी बात का कभी कोई जवाब नहीं दिया था।
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मेडम को वह एक बेजान पत्थर की तरह लगता जिसके अंदर आत्मा नाम की कोई चीज नहीं थी। प्रत्येक डांट, व्यंग्य और सजा के जवाब में वह बस अपनी भावनाओं से खाली नज़रों से उन्हें देखा करता और सिर झुका लेता। मेडम को अब इससे गंभीर नफरत हो चुकी थी।
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पहला सेमेस्टर समाप्त हो गया और प्रोग्रेस रिपोर्ट बनाने का चरण आया तो मेडम ने राजू की प्रगति रिपोर्ट में यह सब बुरी बातें लिख मारी । प्रगति रिपोर्ट माता पिता को दिखाने से पहले हेड मास्टर के पास जाया करती थी। उन्होंने जब राजू की प्रोग्रेस रिपोर्ट देखी तो मेडम को बुला लिया। "मेडम प्रगति रिपोर्ट में कुछ तो राजू की प्रगति भी लिखनी चाहिए। आपने तो जो कुछ लिखा है इससे राजू के पिता इससे बिल्कुल निराश हो जाएंगे।" मेडम ने कहा "मैं माफी माँगती हूँ, लेकिन राजू एक बिल्कुल ही अशिष्ट और निकम्मा बच्चा है । मुझे नहीं लगता कि मैं उसकी प्रगति के बारे में कुछ लिख सकती हूँ। "मेडम घृणित लहजे में बोलकर वहां से उठ कर चली गई स्कूल की छुट्टी हो गई आज तो ।
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अगले दिन हेड मास्टर ने एक विचार किया ओर उन्होंने चपरासी के हाथ मेडम की डेस्क पर राजू की पिछले वर्षों की प्रगति रिपोर्ट रखवा दी । अगले दिन मेडम ने कक्षा में प्रवेश किया तो रिपोर्ट पर नजर पड़ी। पलट कर देखा तो पता लगा कि यह राजू की रिपोर्ट हैं। " मेडम ने सोचा कि पिछली कक्षाओं में भी राजू ने निश्चय ही यही गुल खिलाए होंगे।" उन्होंने सोचा और कक्षा 3 की रिपोर्ट खोली। रिपोर्ट में टिप्पणी पढ़कर उनकी आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उन्होंने देखा कि रिपोर्ट उसकी तारीफों से भरी पड़ी है। "राजू जैसा बुद्धिमान बच्चा मैंने आज तक नहीं देखा।" "बेहद संवेदनशील बच्चा है और अपने मित्रों और शिक्षक से बेहद लगाव रखता है।" " 
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यह लिखा था
अंतिम सेमेस्टर में भी राजू ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। "मेडम ने अनिश्चित स्थिति में कक्षा 4 की रिपोर्ट खोली।" राजू ने अपनी मां की बीमारी का बेहद प्रभाव लिया। .उसका ध्यान पढ़ाई से हट रहा है। "" राजू की माँ को अंतिम चरण का कैंसर हुआ है। । घर पर उसका और कोई ध्यान रखनेवाला नहीं है.जिसका गहरा प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़ा है। 
.
" लिखा था
निचे हेड मास्टर ने लिखा कि राजू की माँ मर चुकी है और इसके साथ ही राजू के जीवन की चमक और रौनक भी। । उसे बचाना होगा...इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। " यह पढ़कर मेडम के दिमाग पर भयानक बोझ हावी हो गया। कांपते हाथों से उन्होंने प्रगति रिपोर्ट बंद की । मेडम की आखो से आंसू एक के बाद एक गिरने लगे. मेडम ने साङी से अपने आंसू पोछे
अगले दिन जब मेडम कक्षा में दाख़िल हुईं तो उन्होंने अपनी आदत के अनुसार अपना पारंपरिक वाक्यांश "आई लव यू ऑल" दोहराया। 
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मगर वह जानती थीं कि वह आज भी झूठ बोल रही हैं। क्योंकि इसी क्लास में बैठे एक उलझे बालों वाले बच्चे राजू के लिए जो प्यार वह आज अपने दिल में महसूस कर रही थीं..वह कक्षा में बैठे और किसी भी बच्चे से अधिक था ।
पढ़ाई के दौरान उन्होंने रोजाना दिनचर्या की तरह एक सवाल राजू पर दागा और हमेशा की तरह राजू ने सिर झुका लिया। जब कुछ देर तक मेडम से कोई डांट फटकार और सहपाठी सहयोगियों से हंसी की आवाज उसके कानों में न पड़ी तो उसने अचंभे में सिर उठाकर मेडम की ओर देखा। अप्रत्याशित उनके माथे पर आज बल न थे, वह मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने राजू को अपने पास बुलाया और उसे सवाल का जवाब बताकर जबरन दोहराने के लिए कहा। राजू तीन चार बार के आग्रह के बाद अंतत:बोल ही पड़ा। इसके जवाब देते ही मेडम ने न सिर्फ खुद खुशान्दाज़ होकर तालियाँ बजाईं बल्कि सभी बच्चो से भी बजवायी..
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फिर तो यह दिनचर्या बन गयी।मेडम हर सवाल का जवाब अपने आप बताती और फिर उसकी खूब सराहना तारीफ करतीं। प्रत्येक अच्छा उदाहरण राजू के कारण दिया जाने लगा । धीरे-धीरे पुराना राजू सन्नाटे की कब्र फाड़ कर बाहर आ गया। अब मेडम को सवाल के साथ जवाब बताने की जरूरत नहीं पड़ती। वह रोज बिना त्रुटि उत्तर देकर सभी को प्रभावित करता और नये नए सवाल पूछ कर सबको हैरान भी करता ।
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उसके बाल अब कुछ हद तक सुधरे हुए होते, कपड़े भी काफी हद तक साफ होते जिन्हें शायद वह खुद धोने लगा था। देखते ही देखते साल समाप्त हो गया और राजू ने दूसरा स्थान हासिल कर कक्षा 5 वी पास कर लिया यानी अब दुसरी जगह स्कूल मे दाखिले के लिए तैयार था।
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कक्षा 5 वी के विदाई समारोह में सभी बच्चे मेडम के लिये सुंदर उपहार लेकर आए और मेडम की टेबल पर ढेर लग गया । इन खूबसूरती से पैक हुए उपहारो में एक पुराने अखबार में बदतर सलीके से पैक हुआ एक उपहार भी पड़ा था। बच्चे उसे देखकर हंस रहे थे । किसी को जानने में देर न लगी कि यह उपहार राजू लाया होगा। मेडम ने उपहार के इस छोटे से पहाड़ में से लपक कर राजू वाले उपहार को निकाला। खोलकर देखा तो उसके अंदर एक महिलाओं द्वारा इस्तेमाल करने वाली इत्र की आधी इस्तेमाल की हुई शीशी और एक हाथ में पहनने वाला एक बड़ा सा कड़ा कंगन था जिसके ज्यादातर मोती झड़ चुके थे। मिस ने चुपचाप इस इत्र को खुद पर छिड़का और हाथ में कंगन पहन लिया। बच्चे यह दृश्य देखकर सब हैरान रह गए। खुद राजू भी। आखिर राजू से रहा न गया और मिस के पास आकर खड़ा हो गया। ।
.
कुछ देर बाद उसने अटक अटक कर मेडम को बोला "आज आप में से मेरी माँ जैसी खुशबू आ रही है।" इतना सुनकर मेडम के आखो मे आसू आ गये ओर मेडम ने राजू को अपने गले से लगा लिया
राजू अब दुसरी स्कूल मे जाने वाला था
राजू ने दुसरी जगह स्कूल मे दाखिले ले लिया था
समय बितने लगा।
दिन सप्ताह,
सप्ताह महीने और महीने साल में बदलते भला कहां देर लगती है?
मगर हर साल के अंत में मेडम को राजू से एक पत्र नियमित रूप से प्राप्त होता जिसमें लिखा होता कि "इस साल कई नए टीचर्स से मिला।। मगर आप जैसा मेडम कोई नहीं था।"
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फिर राजू की पढ़ाई समाप्त हो गया और पत्रों का सिलसिला भी सम्माप्त । कई साल आगे गुज़रे और मेडम रिटायर हो गईं।
एक दिन मेडम के घर अपनी मेल में राजू का पत्र मिला जिसमें लिखा था:
"इस महीने के अंत में मेरी शादी है और आपके बिना शादी की बात मैं नहीं सोच सकता। एक और बात .. मैं जीवन में बहुत सारे लोगों से मिल चुका हूं।। आप जैसा कोई नहीं है.........आपका डॉक्टर राजू
.
पत्र मे साथ ही विमान का आने जाने का टिकट भी लिफाफे में मौजूद था।
मेडम खुद को हरगिज़ न रोक सकी। उन्होंने अपने पति से अनुमति ली और वह राजू के शहर के लिए रवाना हो गईं। शादी के दिन जब वह शादी की जगह पहुंची तो थोड़ी लेट हो चुकी थीं।
.
उन्हें लगा समारोह समाप्त हो चुका होगा.. मगर यह देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही कि शहर के बड़े डॉक्टर , बिजनेसमैन और यहां तक कि वहां पर शादी कराने वाले पंडितजी भी थक गये थे. कि आखिर कौन आना बाकी है...मगर राजू समारोह में शादी के मंडप के बजाय गेट की तरफ टकटकी लगाए उनके आने का इंतजार कर रहा था। फिर सबने देखा कि जैसे ही एक बुड्ढी ओरत ने गेट से प्रवेश किया राजू उनकी ओर लपका और उनका वह हाथ पकड़ा जिसमें उन्होंने अब तक वह कड़ा पहना हुआ था कंगन पहना हुआ था और उन्हें सीधा मंच पर ले गया।
.
राजू ने माइक हाथ में पकड़ कर कुछ यूं बोला "दोस्तों आप सभी हमेशा मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछा करते थे और मैं आप सबसे वादा किया करता था कि जल्द ही आप सबको उनसे मिलाउंगा।।।........ 
ध्यान से देखो यह यह मेरी प्यारी सी मा दुनिया की सबसे अच्छी है यह मेरी मा यह मेरी माँ हैं -
.
!! प्रिय दोस्तों.... इस सुंदर कहानी को सिर्फ शिक्षक और शिष्य के रिश्ते के कारण ही मत सोचिएगा । अपने आसपास देखें, राजू जैसे कई फूल मुरझा रहे हैं जिन्हें आप का जरा सा ध्यान, प्यार और स्नेह नया जीवन दे सकता है...........👍

Saturday, September 11, 2021

हरि बोल 🙏🏻
इस👇 कथा को पढो बहुत अच्छी है 

*सुखी रहने का तरीका*
*********************

      *एक बार की बात है संत तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके समक्ष आया और बोला-*

*गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं, ना आप किसी पे क्रोध करते हैं और ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं? कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए?*

*संत बोले- मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जानता हूँ !*

*"मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?" शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।*

*"तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!" संत तुकाराम दुखी होते हुए बोले।*

*कोई और कहता तो शिष्य ये बात मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं संत तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था?*

*शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहां से चला गया।*

*उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पे क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया था और उनसे माफ़ी मांगता। देखते-देखते संत की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये।*

*शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं। वह उनके समक्ष पहुंचा और बोला-*

*गुरुजी, मेरा समय पूरा होने वाला है, कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!"*

*"मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र। अच्छा, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?"*

*संत तुकाराम ने प्रश्न किया।*

*"नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे, मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था?*
*मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी" शिष्य तत्परता से बोला।*

*"संत तुकाराम मुस्कुराए और बोले, "बस यही तो मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।"*
*"मैं जानता हूँ कि मैं कभी भी मर सकता हूँ, इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।*

*शिष्य समझ गया कि संत तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था ।*

*वास्तव में हमारे पास भी सात दिन ही बचें हैं 😗

*रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि, आठवां दिन तो बना ही नहीं है ।*

🌹👏  *"आइये आज से परिवर्तन आरम्भ करें  और  हरे कृष्ण महामंत्र का जप करे*

🙏🏻सदैव जपिये...
जयश्री कृष्ण
*हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे*
*हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे*

                   🙏🏻खुश रहिये.....☺🙏🏻

Monday, August 30, 2021

Photo from MG Garga

*आज गीता के अमृत ज्ञान  में सतगुरु ने  💐आसुरी वृत्ति के लोग कैसे होते हैं💐 यह समझाया*।
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

💐भगवान श्री कृष्ण कहते हैं की, आसुरी वृत्ति के लोग यह मानते हैं कि इस जगत का कोई स्वामी नहीं है, यह काम से प्रेरित संसार, है जिसमें काम ही इस संसार का कारण है ।अन्य कुछ भी नहीं *विश्व को कोई मूल् सत्ता के अधीन नहीं मानते, यह धर्म और अधर्म को कुछ नहीं मानते इस जगत का निर्माण आकस्मिक हुआ है यह उनकी धारणा है* जबकि यह देखा गया है कि बिना व्यवस्था के कोई निर्माण नहीं हुआ है ।और व्यवस्था द्वारा आपको उचित लाभ भी मिलता है। आसुरी वृत्ति के लोग तर्क की बात करते हैं। जबकि ब्रह्मांड 8 चीजों से प्रमाणित है हमारे इतिहास में भी और विभिन्न मत पंतो में भी लोगों ने इसे बहुत ही अलंकारिक ढंग से समझाया। जबकि यह कोई भौगोलिक स्थिति नहीं है परमात्मा के निवास की ।उसे विज्ञान प्रमाणित नहीं करता ,वह अनुभव वाली बात है जबकि *विज्ञान भी यह कहता है कि हम जानकारी प्राप्त करते हुए ,जब अंतिम चरण में पहुंचते हैं तो यह महसूस होता है कि कोई शक्ति तो है*।

💐इस  मिथ्या ज्ञान को अवलंबन करके जिसकी बुद्धि नष्ट हो गई है ।वह क्रूर कर्म करते हुए ,इस संसार को नष्ट करने में ही रुचि रखते हैं और अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं ।यह नष्टआत्मा है जिनकी उच्चतर लोको में पहुंचने की संभावना नहीं रहती ।यह *अशुद्धियों से भरे शरीर को ही अपना जीवन मानते हैं  यह जगत के शत्रु होते हैं*

💐भगवान ने आगे कहा कि इन 6 आसुरी वृत्तियों से भरे लोग क्या क्या करते हैं ।यह 22 तरह के मद पैदा करते हैं हम इन से मुक्त हो। हमारे जीवन के दो छोर हैं एक है शुक्ल पक्ष और दूसरा कृष्ण पक्ष है। *दंभ ,मान से युक्त मोह बस, मिथ्या धारणाओं को रखकर, अशुद्ध संकल्पों के साथ जीवन में कार्य करते हैं। ऐसे लोग आसुरी वृत्ति वाले होते हैं* ।विडंबना यह है कि हम इंद्रियों द्वारा प्राप्त सुख को ही सुख मानते हैं जबकि हमें यह याद रखना चाहिए ,कि राजा ययाति 3 जीवन जिए। लेकिन अंत में यही कहा, कि यह शरीर 300 वर्षों तक जवान रहा, और पता चला कि जैसे आग में घी डालने से वह बुझती नहीं ,उसी तरह *भोगों को भोगने से तृप्ति नहीं मिलती। उल्टे मानसिक भोग की विकृति बढ़ती जाती है* वह पागल की स्थिति को प्राप्त होता है
भगवान की व्यवस्था है कि किसी चीज की मात्रा संतुलित हो तो ,आनंद आता है अन्यथा वह पीड़ा बन जाती है ऐसे अपवित्र संकल्प वाले लोग संसार में विचरण कर के संसार को गलत दिशा में ले जाते हैं ऐसे लोग खुद दुखी रहते हैं और दूसरों को भी दुखी करते हैं इतिहास में ऐसे राजा रानी की बहुत सारी कहानियां वर्णित हैं।
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दिनांक 30 अगस्त 2021
संकलनकर्ता रविंद्र नाथ द्विवेदी पुणे मंडल
क्रमशः🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 

Fwd: Radha


---------- Forwarded message ---------
From: Madan Gopal Garga <mggarga@gmail.com>
Date: Mon, Aug 30, 2021, 11:43 AM
Subject: Radha
To: Madan Gopal Garga <mggarga@gmail.com>


कृष्ण भक्ति परंपरा के महानत संत सूरदास ने कभी एक स्वप्न देखा था कि रुक्मिणी और राधिका आपस में मिली हैं और एक दूजे पर न्योछावर हुई जा रही हैं।
      
सोचता हूँ, कैसा होगा वह क्षण जब दोनों ठकुरानियाँ मिली होंगी। दोनों ने प्रेम किया था। एक ने बाल-कन्हैया से, दूसरे ने राजनीतिज्ञ कृष्ण से। एक को अपनी मनमोहक बातों के जाल में फँसा लेने वाला कन्हैया मिला था, और दूसरे को मिले थे सुदर्शन चक्रधारी, महायोद्धा कृष्ण।

कृष्ण राधिका के बाल सखा थे, पर राधिका का दुर्भाग्य था कि उन्होंने कृष्ण को तात्कालिक विश्व की महाशक्ति बनते नहीं देखा। राधिका को न महाभारत के कुचक्र जाल को सुलझाते चतुर कृष्ण मिले, न पौंड्रक-शिशुपाल का वध करते बाहुबली कृष्ण मिले।

रुक्मिणी कृष्ण की पत्नी थीं, पटरानी थीं, महारानी थीं, पर उन्होंने कृष्ण की वह लीला नहीं देखी, जिसके लिए विश्व कृष्ण को स्मरण करता है। उन्होंने न माखन चोर को देखा, न गौ-चरवाहे को। उनके हिस्से में न बाँसुरी आयी, न माखन।

कितनी अद्भुत लीला है। राधिका के लिए कृष्ण, कन्हैया था। रुक्मिणी के लिए कन्हैया, कृष्ण थे। पत्नी होने के बाद भी रुक्मिणी को कृष्ण उतने नहीं मिले कि वे उन्हें 'तुम' कह पातीं। आप से तुम तक की इस यात्रा को पूरा कर लेना ही प्रेम का चरम पा लेना है। रुक्मिणी कभी यह यात्रा पूरी नहीं कर सकीं।

राधिका की यात्रा प्रारम्भ ही 'तुम' से हुई थीं। उन्होंने प्रारम्भ ही 'चरम' से किया। शायद तभी उन्हें कृष्ण नहीं मिले।

कितना अजीब है न! कृष्ण जिसे नहीं मिले, युगों युगों से आज तक उसी के हैं, और जिसे मिले, उसे वे मिले ही नहीं। या मिलने का स्वांग रच गये!

तभी कहता हूँ, कृष्ण को पाने का प्रयास मत कीजिये। यदि  प्रयास कीजियेगा, तो कभी नहीं मिलेंगे। प्रेम कर के, बस छोड़ दीजिए, जीवन भर साथ निभाएंगे कृष्ण। कृष्ण इस सृष्टि के सबसे अच्छे मित्र हैं। राधिका हों या सुदामा, कृष्ण ने मित्रता निभाई, तो ऐसी निभाई कि इतिहास बन गया।

राधा और रुक्मिणी जब मिली होंगी, तो रुक्मिणी राधा के वस्त्रों में माखन की गंध ढूंढती होंगी। और राधा ने रुक्मिणी के आभूषणों में कृष्ण का वैभव तलाशा होगा। कौन जाने किसी को कुछ मिला भी या नहीं। सब कुछ कहाँ मिलता है मनुष्य को...  कुछ न कुछ तो छूट ही जाता है।

जितनी चीज़ें कृष्ण से छूटीं, उतनी किसी से नहीं छूटीं। कृष्ण से उनकी माँ छूटी, पिता छूटे, फिर जो नंद-यशोदा मिले, वे भी छूटे। संगी-साथी छूटे। राधा छूटीं। प्रिय बांसुरी छूटी, गोकुल छूटा, मथुरा छूटी। कृष्ण से जीवन भर कुछ न कुछ छूटता ही रहा। कृष्ण जीवन भर छोड़ते ही रहे। परंतु कभी मलाल नहीं किया। सदा मुस्कुराते रहे। इसीलिए उन्हें स्थिति प्रज्ञ कहा गया है। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, अपना मूल चरित्र न बदलने वाला। 
 
आज हमारी आज की पीढ़ी के हाथों से कुछ भी छूट जाए, तो  टूटन होने लगती है। उसे जीना व्यर्थ लगने लगता है। अपने को संभाल नहीं पाता। आज आवश्यकता है, हम कृष्ण को अपना गुरु बना लें। सारथी बना लें, सखा बना लें। जो कृष्ण को समझ लेगा, वह कभी अवसाद ( depression ) में नहीं रहेगा। फालतू के frustration और  aggression से भी बचा रहेगा.  कृष्ण आनंद के देवता हैं। कुछ छूटने पर भी कैसे  प्रसन्न रहा जा सकता है, यह कृष्ण से अच्छा कोई सिखा ही नहीं सकता। योगी भी वियोगी भी! तभी तो पूर्णावतार माने जाते हैं। न उनसा प्रेमी, न उनसा योद्धा! न उनसा सखा,  न उनसा बैरी! न कृष्ण सा भाई , न कृष्ण सा मित्र! 

महागुरु है हम सबका कन्हैया...

🙏
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (5448 वीं ) की
 शुभकामनाएं! 
🙏

Sunday, August 29, 2021

Kahani

🕉️ *हनुमान जी का कर्ज़ा* 🕉️

राम जी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो कुछ दिन पश्चात राम जी ने विभीषण, जामवंत, सुग्रीव और अंगद आदि को अयोध्या से विदा कर दिया, तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में विदा करेंगे, लेकिन राम जी ने हनुमान जी को विदा ही नहीं किया। 
अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात है कि सब गए परन्तु अयोध्या से हनुमान जी नहीं गये।
अब दरबार में कानाफूसी शुरू हुई कि हनुमान जी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता जी की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमान जी चले जायें।

माता सीता बोलीं मै तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक-एक दिन एक-एक कल्प के समान बीत रहा था। वो तो हनुमान जी थे, जो प्रभु मुद्रिका ले के गये, और धीरज बंधवाया कि...
*कछुक दिवस जननी धरु धीरा।*
*कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।*
*निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।*
*तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥*

मैं तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए, आप किसी और से बुलावा लो।

अब बारी आई लखन जी की। तो लक्ष्मण जी ने कहा, मैं तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था।  पूरा राम दल विलाप कर रहा था।
*प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।*
*आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।*

ये तो जो खड़ा है, वो हनुमान जी का लक्ष्मण है। मैं कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमान जी अयोध्या से चले जाएं।

अब बारी आयी भरत जी की। अरे! भरत जी तो इतना रोये, कि राम जी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पे। हनुमान जी का, सब मिलके और लगवा दो और दूसरी बात ये कि...
*बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।* 
*अधम कवन जग मोहि समाना॥*

मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमान जी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...
*रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।*
*सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥*

मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमान जी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो।

अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया। जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े.. मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमान जी को अयोध्या से निकलने के लिए। 
जिन्होंने ने माता सीता, लखन भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो, किसी अच्छे काम के लिए कहते बोल भी देता। मै तो बिल्कुल भी न बोलूं।

अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार... माता सीता ने कहा प्रभु! आप तो तीनों लोकों के स्वामी हो, और देखती हूं आप हनुमान जी से सकुचाते हैं। और आप खुद भी कहते हो कि...!
*प्रति उपकार करौं का तोरा।*
*सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥*

आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु ! राघव जी ने कहा, देवी क़र्ज़दार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो..

*सनमुख होइ न सकत मन मोरा*

देवी ! हनुमान जी का कर्ज़ा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है। क्योंकि कर्ज़ा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न...! यदि सुनना चाहती हो तो सुनो - हनुमान जी का कर्ज़ा कैसे उतारा जा सकता है।

*पहले हनुमान विवाह करें,*
*लंकेश हरें इनकी जब नारी।*
*मुंदरी लै रघुनाथ चले,*
*निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।*
*आयि कहें, सुधि सोच हरें,*
*तन से, मन से होई जाएं उपकारी।*
*तब रघुनाथ चुकायि सकें,*
*ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।*

देवी ! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्ज़ा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि...!

*"सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं"*

मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था। लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमान जी भी कुछ मांग लें। दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए, सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमान जी क्या मांगेंगे, और राम जी क्या देंगे।
राघव जी ने कहा ! हनुमान सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया। विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद, अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ...?
हनुमान जी बोले ! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो...!

*तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना*
*तो फिर यदि मैं दो पद मांगू तो..?*

सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमान जी भी ठीक ही कह रहे हैं। 
राम जी ने कहा ! ठीक है, मांग लो।
सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमान जी का कर्ज़ा चुकता हो जायेगा। हनुमान जी ने कहा ! प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमें राजमद की शंका हो।
तो फिर...! आप को कौन सा पद चाहिए ?
*हनुमान जी ने राम जी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।*

*हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी।*
*नहीं कोउ रामचरण  अनुरागी।*

यह प्रेरक प्रसंग किसी ने भेजा है. उनको मेरा प्रणाम!
पढ़ कर मन शांत ,प्रसन्न और भाव विभोर हो उठता है.
ऐसी रचनाओं को जितना हो सके शेयर करें I

Friday, August 27, 2021

*🌸 सहजोबाई 🌸🙏🏻*

आज सहजो अपनी कुटिया के द्वार पर बैठी है, उसकी गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर परमात्मा उसके सामने प्रकट हुए हैं । लेकिन सहजो के अन्दर कोई उत्साह नहीं है 

परमात्मा ने कहा - सहजो हम स्वयं चलकर आऐ हैं क्या तुम्हे हर्ष नही हो रहा ?

 सहजो ने कहा -- प्रभु ! ये तो आपने अहेतुक कृपा की है, पर मुझे तोआपके दर्शन की भी कामना नही थी।

परमात्मा को झटका लगा।
सहजो तेरे पास ऐसा क्या है ?,  
जो तू मेरा आतिथ्य भी नही करती है ! 

सहजो ने कहा-  मेरे पास मेरा सद्गुरु पूर्ण समर्थ है। भगवन ! मैने आपको अपने सद्गुरु मे पा लिया है, मैं परमात्म तत्व का दर्शन भी करना चाहती हूँ तो केवल अपने सद्गुरु के ही रूप मे। मुझे आपके दर्शनो की कोई अभिलाषा नही है

यदि मै गुरुदेव को कहती तो वह कभी का आपको उठाकर मेरी झोली मे डाल देते।

ये भाव देखकर आज परमात्मा पिघल गया। कहते है - सहजो मुझे अदंर आने के लिए नही कहोगी ?
 
सहजो कहती है- प्रभु मेरी कुटिया के भीतर एक ही आसन है और उस पर भी मेरे सद्गुरु विराजते हैं, क्या आप भूमि पर बैठकर मेरा आतिथ्य स्वीकार करेंगें ?

  भगवान् कहे तुम जहाँ कहोगी हम वहाँ बैठेंगें, भीतर तो आने दो।

भगवान् देखते हैं सचमुच एक ही आसन है, वे भूमि पर ही बैठ गए।

कहा -- सहजो !  मैं जहाँ जाता हूँ कुछ न कुछ देता हूँ ऐसा मेरा नियम है । कुछ माँग ही लो। सहजो कहती है -- प्रभु! मेरे जीवन मे कोई कामना नही है।  प्रभु ने कहा  फिर भी कुछ तो माँग लो । सहजो ने कहा प्रभु ! आप  मुझे क्या दोगे ? 

आप तो स्वयं एक दान हो, जिसे मेरा दाता सद्गुरु अपने अनन्य भक्त को जब चाहे दान कर देता है। अब बताओ प्रभु !  दान बड़ा या दाता ? 

आपने तो प्राणी को जन्म मरण, रोग भोग, सुख दुख मे उलझाया, ये तो मेरे सदगुरु दीनदयाल ने कृपा कर हर प्राणी को विधि बताकर, राह पकड़ा कर, शरण में आये हुए को सहारा देकर उसे निर्भय बनाकर उस द्वन्द से छुड़ाया।

प्रभु मुस्कराते हुए कहते हैं, सहजो ! आज मेरी मर्यादा रख ले, कुछ सेवा ही दे दे।
सहजो ने कहा - प्रभु एक सेवा है, मेरे सद्गुरु आने वाले हैं, जब मैं उन्हे भोजन कराऊँ तो क्या आप उनके पीछे खड़े होकर चमर डुला सकते हो ?

 कथा कहती है कि प्रभु ने सहजो के गुरु चरणदास पर चमर डुलाया। यही है सद्गुरु के प्रति सच्ची समर्पण! , साधक के अंदर अगर स्वर्ग तक की कामना जागृत हो जाय

उसे दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि मुझे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है, यह तो मेरे सच्चे बादशाह यूं ही दे देंगे, लेकिन कब ? जब उसमे मेरा कल्याण होगा
🙏🏻🙏🏻

Monday, August 16, 2021

Kahani

एक बार    गोपीयों ने   श्री   कृष्ण   से   कहा   कि
हमें    अगस्त्य  मुनि   को   भोग   लगाने   जाना   है ।
और   रास्ते   में    यमुना   जी   आती   है   ,अब   तुम  ही
बताओं    हम   उस  पार    कैसे  जाये   ?🙏

     तब    भगवान    श्री  कृष्ण   ने   कहा  ,:      जब  तुम
यमुना जी   के    पास   जावो  , तो   उनसे    कहना   की
अगर   श्री   कृष्ण    ब्रह्मचारी    है  ।  तो    हमें   रास्ता दे
 बस    यमुना   जी    तुम्हें    रास्ता   दे   देगी   🌳🌳

    गोपीया    हंसने    लगी   ,ये   कृष्ण    भी    अपने  आप   को    ब्रह्मचारी    समझता    है  ❤️
  सारा  दिन   तो    हमारे   पीछे   पीछे    घुमता   है  ।
कभी   वस्त्र   चूराता   है    माखन  चुराता  है  , मटकी  तोड़ता   है  । और   ब्रम्हचारी  ,?,,,,,,,,,,,,,,🤣🤣
         खैर    हमें   क्या   , चलो    हम    बोल  देंगे   

     फिर   गोपीया    यमुना   जी   के    पास   जाकर  बोलती   है  ;;;;हे   यमुना   जी   , यदि   श्री कृष्ण  ब्रम्हचारी     है   ,  तो    हमें    रास्ता  दे   ।🌴🌴🌴🌴
    गोपीयोके कहते     ही    यमुना  जी  ने   तुरंत   रास्ता दे   दिया  ।    🤔🤔   गोपीया   आच्क्षर्य   से   भर गई

       अब    गोपीया    अगस्त्य   मुनि  को    भोजन  दें दिया   ,  आते   वक्त   उसने    मुनि   से   कहा   
   हे    मुनीश्वर    रास्ते में    यमुना   जी    आती   है   हम
घर    कैसे    जायेंगे   ? 🤔🤔🙏

       तब   मुनि    अगस्त्य   ने     कहा  ;;  जब    तुम  यमुना   जी    के    पास   जाना   तो    उनसे    ये  कहना
के   मुनि   अगस्त्य     अजिवन   निराहार    है   तो  हमें
रास्ता  दे  ,    बस     यमुना   जी    तुम्हें    रास्ता  दे  देगी

        गोपीया   मन  ही   मन     कहने   लगी   , अभी तो
सारा    भोजन   लाई   थी  ।  सारा  का   सारा   निगट  गये    और   अपने   आप    को   निराहार   कह रहे है
  
      गोपीया    वापस   चल   पड़ी  ,  यमुना  जी के  पास
आकर    कहने   लगी  ,   हे    यमुना   जी    अगर  
    अगस्त्य    मुनि    अजिवन    निराहार   है   ।  तो  हमें
आप   रास्ता  दे   दिजीए    हमें  घर   जाना  है  ।
            यमुना   जी  ने   भी   तुरंत    रास्ता  दे   दिया  
ये   देखकर  भी     गोपीयोकी     आच्क्षर्य   की   सिमा न
रही  🤔    ये   भी    कैसे   हो   सकता    है   ।हम ने
अपनी    आंखों   से   देखा   ,,,, मुनि   को   भोजन  करते
और   वो     अजिवन   निराहार    कैसे  ,🤔🤔🤔🤔

    इस   उधेड़बुन   में     गोपियां   सिधे    श्री   कृष्ण  के
पास   गए   और  आकर   वहीं   प्रश्न   का   उत्तर  जानने के   लिए   उस्तुक   थे   ,🙏🙏🙏🌴🌴🌳🌳🌳

      तब     भगवान   श्री कृष्ण   कहने   लगे   ;; गोपीयों 
मुझे    तुम्हारे    देह   से    कोई    लेना देना    नहीं  है
मैं   तो    तुम्हारी    प्रेम   और   भाव   को    देखकर  😄
तुम्हारे    पिछे    पिछे    घुमता   हु  ।।
         मैं   ने     संसार    को    कभी   भी    वासना  से
नहीं    देखा   ।न  भोगा   , मैं   निराकार ,  निर्मोही    हु  
इसलिए    यमुना   जी   ने    आपको   मार्ग   दे   दिया  ।

दुसरी   बात  ;     मुनि   अगस्त्य    भोजन   करने   से पहले   वो    मुझे    भोग   लगाते   हैं  ।  और   उनका 
भोजन  के    प्रति    कोई    रूचि  नहीं    होती  ❤️
कोई    मोह  नहीं  है  ।  
            उनके    मन   में  ए    कताई    नहीं    होता  कि
मैं   भोजन   कर   रहा  हूं  ।   या   मैं    भोजन   करु  ।
     वो   तो    अपने   अंदर   रह  रहे    मुझे   भोजन  करा    रहे    होते   हैं   । इसलिए   वो   अजिवन निराहार है  ।।  और   इसलिए   जो    मुझे   प्रेम  करता है मैं  उसका    ऋणी    हो   जाता   हूं   🛐🍀🌳🌳🌳🌳

       भावार्थ   ,की   , आंखें   देखी   भी   कभी कभी ग़लत  हो   सकती  है ☝️  हम     संसार   में    रहकर भी 
      ईश्वर   से   प्रेम  कर सकते   हैं   । संसार  छोड़ कर
नहीं   गृहस्थ   ही   सबसे    बड़ा   आश्रम   है  ।।।।🙏
   और कहीं     मठ   पुजा  ,वन  उपवन   आश्रम  तिर्थ
जाने   की    कोई   आवश्यकता  नहीं है 🌳🍀🙏

         
    संत  न   छोड़ें    संत ई   जो    कोटी  क   मिले  असंत
   चंदन   ,भुवंगा    बैठीया  ,। तहु    शितलता  न   तंजतं

      सज्जन   को   चाहे   करोड़  दृष्ट    पुरुष   मिल जाए
वो  अपने   स्वभाव  को  नहीं   छोड़ता ।
जैसे   चंदन   के   पेड़  पर  ,अनेक   सांप   लिपटे  रहते हैं ।   फिर  भी   वह   अपनी    सितलता नहीं छोड़ता
      
            जय श्री राधे राधे जी 🙏🌷
      
             जो  तु   सेवक    गुरु   का , निंदा  की  तज बान
          निंदक  नियारे   आय तब ,  कर   आदर   सनमान

Tuesday, July 13, 2021

एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं....
वैज्ञानिक कारण हैं..

एक दिन डिस्कवरी पर जेनेटिक
बीमारियों से सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम
देख रहा था ... उस प्रोग्राम में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा की जेनेटिक बीमारी न हो इसका एक ही इलाज है और वो है "सेपरेशन ऑफ़
जींस".. मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नही करना चाहिए ..क्योकि नजदीकी
रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नही हो पाता और जींस लिंकेज्ड
बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और
एल्बोनिज्म होने की १००% चांस होती है ..
फिर मुझे
बहुत ख़ुशी हुई जब उसी कार्यक्रम में ये
दिखाया गया की आखिर हिन्दूधर्म में
हजारों सालों पहले जींस और डीएनए के बारे में
कैसे
लिखा गया है ? हिंदुत्व में कुल सात गोत्र होते
है
और एक गोत्र के लोग आपस में शादी नही कर
सकते
ताकि जींस सेपरेट (विभाजित) रहे.. उस वैज्ञानिक ने
कहा की आज पूरे विश्व
को मानना पड़ेगा की हिन्दूधर्म ही विश्व का
एकमात्र
ऐसा धर्म है जो "विज्ञान पर आधारित" है !
हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क:

1- कान छिदवाने की परम्परा: 

भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है।
वैज्ञानिक तर्क-
दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है। जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित रहता है।

2-: माथे पर कुमकुम/तिलक

महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं। 
वैज्ञानिक तर्क- आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है। इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता 

3- : जमीन पर बैठकर भोजन

भारतीय संस्कृति के अनुसार जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है। 
वैज्ञानिक तर्क- पलती मारकर बैठना एक प्रकार का योग आसन है। इस पोजीशन में बैठने से मस्त‍िष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त अगर दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोजीशन में बैठते ही खुद-ब-खुद दिमाग से एक सिगनल पेट तक जाता है, कि वह भोजन के लिये तैयार हो जाये।

4- : हाथ जोड़कर नमस्ते करना

जब किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा नमस्कार करते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- जब सभी उंगलियों के शीर्ष एक दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है। एक्यूप्रेशर के कारण उसका सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है, ताकि सामने वाले व्यक्त‍ि को हम लंबे समय तक याद रख सकें। दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने (पश्च‍िमी सभ्यता) के बजाये अगर आप नमस्ते करते हैं तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते। अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस आप तक नहीं पहुंचेगा।

5-: भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से

जब भी कोई धार्मिक या पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से होता है। 
वैज्ञानिक तर्क- तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है। इससे पेट में जलन नहीं होती है।

6-: पीपल की पूजा
तमाम लोग सोचते हैं कि पीपल की पूजा करने से भूत-प्रेत दूर भागते हैं। 
वैज्ञानिक तर्क- इसकी पूजा इसलिये की जाती है, ताकि इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े और उसे काटें नहीं। पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता ह

7-: दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना

दक्ष‍िण की तरफ कोई पैर करके सोता है, तो लोग कहते हैं कि बुरे सपने आयेंगे, भूत प्रेत का साया आ जायेगा, आदि। इसलिये उत्तर की ओर पैर करके सोयें। 
वैज्ञानिक तर्क- जब हम उत्तर की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर संचारित होने लगता है। इससे अलजाइमर, परकिंसन, या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। यही नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है।

8-सूर्य नमस्कार
हिंदुओं में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परम्परा है। 
वैज्ञानिक तर्क- पानी के बीच से आने वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुंचती हैं, तब हमारी आंखों की रौशनी अच्छी होती है।

9-सिर पर चोटी

हिंदू धर्म में ऋषि मुनी सिर पर चुटिया रखते थे। आज भी लोग रखते हैं। 
वैज्ञानिक तर्क- जिस जगह पर चुटिया रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं। इससे दिमाग स्थ‍िर रहता है और इंसान को क्रोध नहीं आता, सोचने की क्षमता बढ़ती है।

10-व्रत रखना

कोई भी पूजा-पाठ या त्योहार होता है, तो लोग व्रत रखते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- आयुर्वेद के अनुसार व्रत करने से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से शरीर का डीटॉक्सीफिकेशन होता है, यानी उसमें से खराब तत्व बाहर निकलते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से कैंसर का खतरा कम होता है। हृदय संबंधी रोगों, मधुमेह, आदि रोग भी जल्दी नहीं लगते।

11-चरण स्पर्श करना

हिंदू मान्यता के अनुसार जब भी आप किसी बड़े से मिलें, तो उसके चरण स्पर्श करें। यह हम बच्चों को भी सिखाते हैं, ताकि वे बड़ों का आदर करें। 
वैज्ञानिक तर्क- मस्त‍िष्क से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है। इसे कॉसमिक एनर्जी का प्रवाह कहते हैं। इसमें दो प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह होता है, या तो बड़े के पैरों से होते हुए छोटे के हाथों तक या फिर छोटे के हाथों से बड़ों के पैरों तक।

12-क्यों लगाया जाता है सिंदूर

शादीशुदा हिंदू महिलाएं सिंदूर लगाती हैं। 
वैज्ञानिक तर्क- सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी होता है। यह मिश्रण शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है। चूंकि इससे यौन उत्तेजनाएं भी बढ़ती हैं, इसीलिये विधवा औरतों के लिये सिंदूर लगाना वर्जित है। इससे स्ट्रेस कम होता है।

13- तुलसी के पेड़ की पूजा
तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्ध‍ि आती है। सुख शांति बनी रहती है। 
वैज्ञानिक तर्क- तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है। लिहाजा अगर घर में पेड़ होगा, तो इसकी पत्त‍ियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे बीमारियां दूर होती हैं।

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अगर हिंदू परम्पराओं से जुड़े ये वैज्ञानिक तर्क आपको वाकई में पसंद आये हैं, तो इस लेख को शेयर कीजिये, ताकि आगे से कोई भी इस परम्परा को ढकोसला न कहे।

Wednesday, July 7, 2021

भूलना सीखो

भूलना सीखो दुनियाँ की बातों को, भूलना सीखो किसी का भला कर दिया उसको और भूलना सीखो किसी ने कुछ अपशब्द कह दिए उसको।

 

परम पूज्य सुधांशुजी महाराज

Saturday, July 3, 2021

kahani

*राजा भोज एक बहुत बड़े दानवीर थे। उनकी ये एक खास बात थी कि जब वो दान देने के लिए✊ हाथ आगे बढ़ाते तो अपनी 😞नज़रें नीचे झुका लेते थे।*
          
*ये बात सभी को अजीब लगती थी कि ये राजा कैसे दानवीर हैं। ये दान भी देते हैं और इन्हें शर्म भी आती है।*

*ये बात जब तुलसीदासजी  तक पहुँची तो उन्होंने राजा को चार पंक्तियाँ लिख भेजीं जिसमें लिखा था* -

*ऐसी देनी देन जु*
               *कित सीखे हो सेन।*
*ज्यों ज्यों कर ऊँचौ करौ*
                *त्यों त्यों नीचे नैन।।*

*इसका मतलब था कि राजा  तुम ऐसा दान देना कहाँ से सीखे हो? जैसे जैसे तुम्हारे हाथ ऊपर उठते हैं वैसे वैसे तुम्हारी नज़रें तुम्हारे नैन नीचे क्यूँ झुक जाते हैं?*

*राजा ने इसके बदले में जो जवाब दिया वो जवाब इतना गजब का था कि जिसने भी सुना वो राजा का कायल हो गया।* 
*इतना प्यारा जवाब आज तक किसी ने किसी को नहीं दिया।*

*राजा ने जवाब में लिखा* -

*देनहार कोई और है*
                *भेजत जो दिन रैन।*
*लोग भरम हम पर करैं*
                   *तासौं नीचे नैन।।*

*मतलब, देने वाला तो कोई और है वो ईश्वर   है वो परमात्मा है वो दिन रात भेज रहा है। परन्तु लोग ये समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ राजा दे रहा है। ये सोच कर मुझे शर्म आ जाती है और मेरी आँखें नीचे झुक जाती हैं।* 
 *वो ही करता और वो ही करवाता है, क्यों बंदे तू इतराता है,*

*एक साँस भी नही है तेरे बस की, वो ही सुलाता और वो ही जगाता है.........🙏*

Sunday, June 13, 2021

संग्रह के रोग को छोडकर

संग्रह के रोग को छोडकर भगवान की ओर जाने का प्रयास करें । उसकी कृपा मिल गई तो समझो सबकुछ मिल गया। यह हमेशा ध्यान रखें कि माल का संग्रह कर उसे सही-सलामत रखने में बहुत बड़ी चिंता होती है, जबकि माला फ़ेरकर प्रभु चिंतन करने में निश्चिंतता आती है। जहाँ निश्चिंतता है वही आनन्द और सुख-शांति है।

 

परम पूज्य सु्धांशुजी महाराज  

Wednesday, May 26, 2021

Msan

🌹💖🙏 *माँ का तोहफ़ा* 🙏💖🌹
एक मर्मस्पर्शी कहानी, अवश्य पढ़ें।*
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एक दंपती दीपावली की ख़रीदारी करने को हड़बड़ी में था। पति ने पत्नी से कहा, "ज़ल्दी करो, मेरे पास टाईम नहीं है।" कह कर कमरे से बाहर निकल गया। तभी बाहर लॉन में बैठी *माँ* पर उसकी नज़र पड़ी।

कुछ सोचते हुए वापस कमरे में आया और अपनी पत्नी से बोला, "शालू, तुमने माँ से भी पूछा कि उनको दिवाली पर क्या चाहिए?

शालिनी बोली, "नहीं पूछा। अब उनको इस उम्र में क्या चाहिए होगा यार, दो वक्त की रोटी और दो जोड़ी कपड़े....... इसमें पूछने वाली क्या बात है?

यह बात नहीं है शालू...... माँ पहली बार दिवाली पर हमारे घर में रुकी हुई है। वरना तो हर बार गाँव में ही रहती हैं। तो... औपचारिकता के लिए ही पूछ लेती।

अरे इतना ही माँ पर प्यार उमड़ रहा है तो ख़ुद क्यों नहीं पूछ लेते? झल्लाकर चीखी थी शालू ...और कंधे पर हैंड बैग लटकाते हुए तेज़ी से बाहर निकल गयी।

सूरज माँ के पास जाकर बोला, "माँ, हम लोग दिवाली की ख़रीदारी के लिए बाज़ार जा रहे हैं। आपको कुछ चाहिए तो.. 

माँ बीच में ही बोल पड़ी, "मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटा।" 

सोच लो माँ, अगर कुछ चाहिये तो बता दीजिए.....

सूरज के बहुत ज़ोर देने पर माँ बोली, "ठीक है, तुम रुको, मैं लिख कर देती हूँ। तुम्हें और बहू को बहुत ख़रीदारी करनी है, कहीं भूल न जाओ।" कहकर सूरज की माँ अपने कमरे में चली गईं। कुछ देर बाद बाहर आईं और लिस्ट सूरज को थमा दी।......  
           
सूरज ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए बोला, "देखा शालू, माँ को भी कुछ चाहिए था, पर बोल नहीं रही थीं। मेरे ज़िद करने पर लिस्ट बना कर दी है। इंसान जब तक ज़िंदा रहता है, रोटी और कपड़े के अलावा भी बहुत कुछ चाहिये होता है।"

अच्छा बाबा ठीक है, पर पहले मैं अपनी ज़रूरत का सारा सामान लूँगी। बाद में आप अपनी माँ की लिस्ट देखते रहना। कहकर शालिनी कार से बाहर निकल गयी।

पूरी ख़रीदारी करने के बाद शालिनी बोली, "अब मैं बहुत थक गयी हूँ, मैं कार में A/C चालू करके बैठती हूँ, आप अपनी माँ का सामान देख लो।"

अरे शालू, तुम भी रुको, फिर साथ चलते हैं, मुझे भी ज़ल्दी है।

देखता हूँ माँ ने इस दिवाली पर क्या मँगाया है? कहकर माँ की लिखी पर्ची ज़ेब से निकालता है। 

बाप रे! इतनी लंबी लिस्ट, ..... पता नहीं क्या - क्या मँगाया होगा? ज़रूर अपने गाँव वाले छोटे बेटे के परिवार के लिए बहुत सारे सामान मँगाये होंगे। और बनो *श्रवण कुमार*, कहते हुए शालिनी गुस्से से सूरज की ओर देखने लगी। 

पर ये क्या? सूरज की आँखों में आँसू........ और लिस्ट पकड़े हुए हाथ सूखे पत्ते की तरह हिल रहा था..... पूरा शरीर काँप रहा था।

शालिनी बहुत घबरा गयी। क्या हुआ, ऐसा क्या माँग लिया है तुम्हारी माँ ने? कहकर सूरज के हाथ से पर्ची झपट ली.... 

हैरान थी शालिनी भी। इतनी बड़ी पर्ची में बस चंद शब्द ही लिखे थे..... 

*पर्ची में लिखा था....*       

"बेटा सूरज मुझे दिवाली पर तो क्या किसी भी अवसर पर कुछ नहीं चाहिए। फिर भी तुम ज़िद कर रहे हो तो...... तुम्हारे शहर की किसी दुकान में अगर मिल जाए तो *फ़ुरसत के कुछ पल* मेरे लिए लेते आना.... ढलती हुई साँझ हूँ अब मैं। सूरज, मुझे गहराते अँधियारे से डर लगने लगा है, बहुत डर लगता है। पल - पल मेरी तरफ़ बढ़ रही मौत को देखकर.... जानती हूँ टाला नहीं जा सकता, शाश्वत सत्‍य है..... पर अकेलेपन से बहुत घबराहट होती है सूरज।...... तो जब तक तुम्हारे घर पर हूँ, कुछ पल बैठा कर मेरे पास, कुछ देर के लिए ही सही बाँट लिया कर मेरे बुढ़ापे का अकेलापन।.... बिन दीप जलाए ही रौशन हो जाएगी मेरी जीवन की साँझ.... कितने साल हो गए बेटा तुझे स्पर्श नहीं किया। एक बार फिर से, आ मेरी गोद में सर रख और मैं ममता भरी हथेली से सहलाऊँ तेरे सर को। एक बार फिर से इतराए मेरा हृदय मेरे अपनों को क़रीब, बहुत क़रीब पा कर....और मुस्कुरा कर मिलूँ मौत के गले। क्या पता अगली दिवाली तक रहूँ ना रहूँ..... 

पर्ची की आख़िरी लाइन पढ़ते - पढ़ते शालिनी फफक-फफक कर रो पड़ी.....

*ऐसी ही होती हैं माँ.....* 

दोस्तो, अपने घर के उन विशाल हृदय वाले लोगों, जिनको आप बूढ़े और बुढ़िया की श्रेणी में रखते हैं, वे आपके जीवन के कल्पतरु हैं। उनका यथोचित आदर-सम्मान, सेवा-सुश्रुषा और देखभाल करें। यक़ीन मानिए, आपके भी बूढ़े होने के दिन नज़दीक ही हैं।...उसकी  तैयारी आज से ही कर लें। इसमें कोई शक़ नहीं, आपके अच्छे-बुरे कृत्य देर-सवेर आप ही के पास लौट कर आने हैं।।

*कहानी अच्छी लगी हो तो कृपया अग्रसारित अवश्य कीजिए। शायद किसी का हृदय परिवर्तन हो जाए और.....*

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काशी में, एक ब्राह्मण के सामने से एक गाय भागती हुई किसी गली में घुस गई। तभी वहां, एक आदमी आया उसने गाय के बारे में पूछा: - पंडितजी माला फेर रहे थे, इसलिए कुछ बोले नहीं, बस हाथ से उस गली का इशारा कर दिया जिधर गाय गई थी । पंडितजी इस बात से अंजान थे, कि वह आदमी कसाई है, और गौमाता उसके चंगुल से जान बचाकर भागी थीं। कसाई ने पकड़कर गोवध कर दिया। अंजाने में हुए इस घोर पाप के कारण पंडितजी अगले जन्म मे�